कोयले से बनेगा भारत का भविष्य

सरकार ने खोला 37,500 करोड़ का खजाना

जब दुनिया में तेल और गैस के लिए मारामारी हो, जब पश्चिम एशिया की जंग हमारे आयात बिल को रोज महंगा करे तब एक समझदार देश अपने घर में झांकता है। भारत के घर में क्या है? जमीन के नीचे दबा हुआ अरबों टन कोयला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 13 मई 2026 को एक बड़ा फैसला लिया। सरकार ने कोयला गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं है यह भारत की ऊर्जा नीति में एक बड़े बदलाव की शुरुआत है।
पहले जानिए : कोयला गैसीकरण है क्या?
बहुत सरल भाषा में कहें तो कोयले को जलाने की बजाय उसे गैस में बदलना। इस प्रक्रिया में कोयले को ऊंचे तापमान और दबाव पर रासायनिक तरीके से एक खास गैस में बदला जाता है, जिसे कृत्रिम गैस कहते हैं। यह गैस बहुत काम की होती है। इससे यूरिया बन सकता है, जो किसानों के खेतों में खाद के रूप में जाता है। इससे मेथनॉल बनता है, जो ईंधन और रसायन उद्योग में काम आता है। इससे अमोनिया बनती है, जो उर्वरक कारखानों की रीढ़ है। और इससे प्राकृतिक गैस जैसी कृत्रिम गैस भी बन सकती है। अभी भारत इन सब चीजों का बड़ा हिस्सा बाहर से मंगाता है और इसके लिए हर साल करोड़ों डॉलर खर्च होते हैं।
आयात की यह निर्भरता कितनी महंगी है?
यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। वित्त वर्ष 2025 में भारत ने तरलीकृत प्राकृतिक गैस, यूरिया, अमोनिया, मेथनॉल और कोकिंग कोयले के आयात पर करीब 2.77 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। यानी यह पैसा भारत से बाहर चला गया। अभी हालत यह है कि देश में जितनी अमोनिया की जरूरत है, वह पूरी तरह बाहर से आती है। मेथनॉल का 80 से 90 फीसदी हिस्सा विदेश से मंगाना पड़ता है। तरलीकृत प्राकृतिक गैस का 50 फीसदी से ज्यादा आयात होता है। यूरिया की भी करीब 20 फीसदी जरूरत बाहर से पूरी होती है। जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, जब समुद्री रास्ते बाधित होते हैं तो यह पूरी निर्भरता भारी पड़ती है। कीमतें बढ़ती हैं, खाद महंगी होती है, किसान परेशान होते हैं और सरकार पर बोझ बढ़ता है।
इस योजना में है क्या?
सरकार ने 37,500 करोड़ रुपये की यह राशि उन कंपनियों को प्रोत्साहन के रूप में देने का फैसला किया है जो कोयला गैसीकरण के कारखाने लगाएंगी। प्रोत्साहन की रकम कारखाने में लगाई जाने वाली मशीनों और उपकरणों की कुल लागत का अधिकतम 20 फीसदी होगी। यह पैसा एक बार में नहीं, बल्कि चार किस्तों में दिया जाएगा और हर किस्त तब मिलेगी जब परियोजना अपना एक-एक पड़ाव पार करेगी। किसी भी एक परियोजना को अधिकतम 5,000 करोड़ रुपये की सहायता मिलेगी। एक ही उत्पाद बनाने वाली परियोजनाओं को मिलाकर 9,000 करोड़ से ज्यादा नहीं दिए जाएंगे। और एक कंपनी समूह को सभी परियोजनाओं में मिलाकर अधिकतम 12,000 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। परियोजनाओं का चुनाव खुली प्रतियोगिता के जरिए होगा कोई मनमानी नहीं, कोई पक्षपात नहीं।
इस फैसले से क्या बदलेगा?
इस योजना के कई असर होंगे जो सीधे आम आदमी तक पहुंचेंगे।
पहला असर — रोजगार: इस योजना के तहत 25 परियोजनाएं लगने की उम्मीद है। इनसे देशभर में खासकर कोयला उत्पादक इलाकों में करीब 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी। वे इलाके जो अब तक सिर्फ कोयला खनन पर निर्भर थे, वहां नए उद्योग खड़े होंगे।
दूसरा असर — निवेश: इस 37,500 करोड़ की सरकारी मदद से निजी क्षेत्र को भी बड़े पैमाने पर निवेश के लिए आकर्षित किया जाएगा। अनुमान है कि इससे कुल 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश देश में आएगा। तीसरा असर — सरकारी आमदनी: 75 मिलियन टन कोयले के गैसीकरण से सरकार को सालाना करीब 6,300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलेगा। इसके अलावा इन कारखानों से माल बनने पर जो कर लगेगा, वह अलग से आएगा।
चौथा असर — महंगाई पर लगाम: जब यूरिया और अमोनिया देश में ही बनने लगेंगे, तो किसानों को खाद के लिए ज्यादा नहीं चुकाना पड़ेगा। यह सीधे खेती की लागत घटाएगा।
2030 का लक्ष्य और लंबी राह
सरकार का इरादा है कि 2030 तक भारत 10 करोड़ टन कोयले का गैसीकरण करे। यह योजना उसी दिशा में एक बड़ा कदम है। यह पहला कदम नहीं है। 2021 में राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन शुरू हुआ था। जनवरी 2024 में 8,500 करोड़ रुपये की एक योजना मंजूर हुई थी, जिसके तहत 8 परियोजनाएं पहले से काम कर रही हैं। अब यह 37,500 करोड़ की नई योजना उसी नींव को और मजबूत बनाएगी। सरकार ने कोयला आपूर्ति की अवधि भी 30 साल तक बढ़ा दी है, ताकि निवेशकों को लंबे समय की नीतिगत स्थिरता मिले और वे बेझिझक पैसा लगाएं।
यह देश के लिए क्यों जरूरी था?
भारत के पास करीब 401 अरब टन कोयले का भंडार है और 47 अरब टन लिग्नाइट है। देश की ऊर्जा जरूरतों का 55 फीसदी से ज्यादा हिस्सा अभी कोयले से ही पूरा होता है। यह भंडार अगले 200 साल तक चलने के लिए पर्याप्त है। जब इतनी दौलत जमीन में दबी हो, तो उसे जलाकर बर्बाद करना समझदारी नहीं है। उसे गैस में बदलकर, रसायन बनाकर, उर्वरक तैयार करके उसकी पूरी कीमत वसूलना यही असली आत्मनिर्भरता है। यह योजना उसी सोच का नतीजा है।